Iss Tarah
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📜 Lyrics
अंबर से सागर मिले, ले चल तू वहाँ मुझे
इस तरह आ कि फिर हम मिल न पाएँ
आ जा शाम ढलती जाए, जाना ढूँढे तुझे दीवाना
इस तरह आ कि फिर हम मिल न पाएँ
आ जा शाम ढलती जाए, जाना ढूँढे तुझे दीवाना
आधा दिल, आधी रूह, मैं आधा हूँ, आधी तू
ऐसे हों फिर हम क्यूँ रह जाएँ आधे यूँ?
क्या कुछ ऐसा करें हम समय के परे
मिल जाएँ और पिघल जाएँ
आधा दिन, आधी रात, आकाश से रंग चुरा
तोड़ लूँ, घोल दूँ, एक प्याले में सब भुला
प्याला मैं भी पियूँ, प्याला तू भी पिए
मिल जाएँ और वक़्त पिघल जाए
ऐसी कोई जहाँ मिले, ले चल तू वहाँ मुझे
इस तरह आ कि फिर हम मिल न पाएँ
आ जा शाम ढलती जाए,जाना ढूँढे तुझे दीवाना
इस तरह आ कि फिर हम मिल न पाएँ
आ जा शाम ढलती जाए,जाना ढूँढे तुझे दीवाना
क्या मैंने कोई माँगी दुआ या सजदा कोई किया?
किसी ऋषि की लगी हो कृपा जो मैंने तुझे देखा
पैरों में पायल बोले, नाचूँ मैं मीरा-सी
शरमाए राधा-सा मन गर मेरे मोहन हँसें
अगर हो प्यार मुझसे ज़रा, बाहों में अब भर लो ना
कल क्या हो, किसने जाना?
इस तरह आ कि फिर हम मिल न पाएँ
आ जा शाम ढलती जाए, जाना ढूँढे तुझे दीवाना
घर से आवारा मैं, पाँव में छाले लिए, चलता रहा, चलता रहा
होंठों पे तेरा नाम, ख़ुद से ही बातें सिल के रखता रहा, रखता रहा
भँवरों ने मुझसे कहा, पागल पतंगा हुआ
शायद उनको दिखा नहीं तू जो मुझे दिखा
अब बस ये पूछता हूँ तुझसे मैं, ऐसा क्या था मुझमें जो तू मुझे न दिखा?
इस तरह आ कि फिर हम मिल न पाएँ
आ जा शाम ढलती जाए, जाना ढूँढे तुझे दीवाना
इस तरह आ कि फिर हम मिल न पाएँ
आ जा शाम ढलती जाए, जाना ढूँढे तुझे दीवाना
आधा दिल, आधी रूह, मैं आधा हूँ, आधी तू
ऐसे हों फिर हम क्यूँ रह जाएँ आधे यूँ?
क्या कुछ ऐसा करें हम समय के परे
मिल जाएँ और पिघल जाएँ
आधा दिन, आधी रात, आकाश से रंग चुरा
तोड़ लूँ, घोल दूँ, एक प्याले में सब भुला
प्याला मैं भी पियूँ, प्याला तू भी पिए
मिल जाएँ और वक़्त पिघल जाए
ऐसी कोई जहाँ मिले, ले चल तू वहाँ मुझे
इस तरह आ कि फिर हम मिल न पाएँ
आ जा शाम ढलती जाए,जाना ढूँढे तुझे दीवाना
इस तरह आ कि फिर हम मिल न पाएँ
आ जा शाम ढलती जाए,जाना ढूँढे तुझे दीवाना
क्या मैंने कोई माँगी दुआ या सजदा कोई किया?
किसी ऋषि की लगी हो कृपा जो मैंने तुझे देखा
पैरों में पायल बोले, नाचूँ मैं मीरा-सी
शरमाए राधा-सा मन गर मेरे मोहन हँसें
अगर हो प्यार मुझसे ज़रा, बाहों में अब भर लो ना
कल क्या हो, किसने जाना?
इस तरह आ कि फिर हम मिल न पाएँ
आ जा शाम ढलती जाए, जाना ढूँढे तुझे दीवाना
घर से आवारा मैं, पाँव में छाले लिए, चलता रहा, चलता रहा
होंठों पे तेरा नाम, ख़ुद से ही बातें सिल के रखता रहा, रखता रहा
भँवरों ने मुझसे कहा, पागल पतंगा हुआ
शायद उनको दिखा नहीं तू जो मुझे दिखा
अब बस ये पूछता हूँ तुझसे मैं, ऐसा क्या था मुझमें जो तू मुझे न दिखा?