Karna Vs Arjun (Rap Battle)
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📜 Lyrics
हे गांडीवधारी अर्जुन तुम बेशक हो महान
अस्त्र शस्त्र और वेदों का तुम्हें भली भांति है ज्ञान
पर सूत पुत्र ये कर्ण तुम्हारा तोड़ेगा अभिमान
समस्त जगत ये जानेगा कि मैं ही था बलवान
अरे सृष्टि ने अन्याय किया मैं क्यों न करूं गुमान
तुम्हें मेरे दुखों और पीड़ा का न है अर्जुन अनुमान
अरे बचपन से ना जाने अर्जुन क्या क्या मैंने देखा
मुझे लगता मेरे हाथों की संघर्ष भरी है रेखा
मेरी मां ने मुझको पैदा होते नदी में बहाया
मैं सूर्यपुत्र हूं किंतु एक सूत पुत्र कहलाया
मेरे साथ हुआ अन्याय गुरु द्रोण ने ना दी शिक्षा
अरे जीवन भर ही देता रहा सामर्थ्य की परीक्षा
क्रीड़ा स्थल में तुमने अर्जुन करतब क्या दिखलाए
गुरु द्रोण तो अभिमान में भूले न समाए
जब भरी सभा में गुरु द्रोण ने अर्जुन का बखान किया
चोट लगी मेरे सीने सारे योद्धा का अपमान किया
मुझसे ना जरा भी सहन हुआ मैंने तुमको ललकारा
सभा में बैठे सबने मुझको सूत पुत्र पुकारा
मेरी विद्या का अपमान हुआ मैं भाग भी ना ले पाया
वो दुर्योधन था साथ खड़ा मुझे अंगराज बनाया
चाहे पापी था या कपटी मुझको है उस पे मान
अरे मित्रता की खातिर अपने दे दूंगा प्राण
द्रोपती के स्वयंभर में भी बना ना प्रतिभागी
मुझे सूत पुत्र कह रोका गया क्रोध अग्नि भीतर लागी
श्री परशुराम से विद्या पाई मिल गया उनसे श्राप
निष्ठा पूर्वक की सेवा फिर हो गया कैसा पाप
मां कुंती आई युद्ध से पूर्व मुझको सत्य बताने
मेरी परवाह ना थी उनको वो चाहे माने या ना माने
पांचों पुत्रों का जीवन दान माता कुंती ने मांगा
पांचों की फिकर थी उनको क्यों छठवें को ना मांगा
मैंने भी दे दिया वचन कि मां तेरे पांच पुत्र रहेंगे
कोई एक मरेगा अर्जुन या मैं जिंदा पांच बचेंगे
इंदर भी आए भेष बदल मैंने कवच को दे दिया दान
मैं पहले से ये जान गया था बन के रहा अनजान
करे भीष्म पितामह पक्षपात मुझे नफरत वो करते थे
मुझे रण में जाने से रोकते थे क्या युद्ध से वो डरते थे
हे अर्जुन कैसा लिखा था ये विधि का विधान
मेरे काम ना कोई आ पाया जो मिला था मुझको ज्ञान
मेरा पहिया रथ का धस गया मैं विद्या भूल गया सारी
मैं समझ ना पाया माधव की ये माया थी तुम्हारी
मेरे सामर्थ्य का परिचय अब कभी ना हो पाएगा
मुझे इसी बात का अंत तक अफसोस ही रह जाएगा
मेरे सामर्थ्य का परिचय अब कभी ना हो पाएगा
मुझे इसी बात का अंत तक अफसोस ही रह जाएगा
मैं द्रोणाचार्य का शिष्य अर्जुन है मेरा नाम
कुरुक्षेत्र के रण में थे सारथी मेरे श्याम
मैं अनुज आपका दानवीर करता हूं परिणाम
माधव के बताएं पथ पे चलना मेरा काम
क्यों सदा धर्म की बात करो जब धर्म पे चल ना पाए
क्यों दुर्योधन के पीछे लगकर पाप तुमने कमाए
मुझे युद्ध में हराने के लिए सब सीमा लांघ आए
सही गलत का दानवीर तुम फर्क समझ ना पाए
माना कि माता कुंती से हो गई थी भ्राता भूल
पर सारा जीवन पाप के उनको चुभते थे ये शूल
माता को भी था दर्द हुआ जब तुम्हें किया था दूर
पर कन्या कुंवारी करती क्या वो बेवस्ती मजबूर
समाज के डर से सत्य छिपा वो कैसी रीति होगी
मैं सोच भी ना सकता क्या भ्राता तुम पे बीती होगी
माता ने जो भी पाप किया वो जीवन भर छिपाती रही
तुम्हें याद करके भराता मैया आंसू रोज बहाती रही
मां कुंती ने तुमको त्यागा क्या मेरा था कसूर
एक अनुज के हाथों ज्येष्ठ मरा किया नियती ने मजबूर
गुरु द्रोण ने शिक्षा देने से ना कभी भी तुमको रोका
पर तुमको मुझसे श्रेष्ठ बनने का चाहिए था बस मौका
गुरु द्रोण ने मुझसे स्पर्धा के लिए क्षत्रियों को पुकारा
तुमने आके तब अहंकार में मुझको था ललकारा
इस बात का फायदा उठाकर दुर्योधन आगे आया
अपने स्वार्थ में मूर्ख ने तुमको अंगराज बनाया
मैं मानता हूं कि सूत पुत्र कह सबने किया अपमान
पर दुर्योधन की चालों से तुम तनिक ना थे अनजान
अरे द्युत सभा में दुर्योधन को तुमने था उकसाया
और मायावी पासों से पांचाली का दाब लगवाया
तुम जानते थे कि शकुनी के मायावी थे वो पासे
अब देखो भ्राता रण में कैसे बिछी पड़ी है लाशें
तुम्हें लगता था कि भीष्म पितामह नफरत तुमसे करते थे
सत्य तुम्हारा जानते थे और फिकर तुम्हारी करते थे
लगता था कि भीष्म पितामह नफरत तुमसे करते थे
वो सत्य तुम्हारा जानते थे और फिकर तुम्हारी करते थे
तुम दान सदा ही करते रहे और दानवीर कहलाए
सब पुण्य तुम्हारे फीके पड़े तो पाप तुमने कब आए
जब भरी सभा में पांचाली को वैश्य तुमने बुलाया
और अभिमन्यु का वध किया उसे चक्रव्यूह में फंसाया
तुम दुखी हो करण की नियती ने क्यों मुख है तुमसे फेरा
तब धर्म कहां था सात लोगों ने पुत्र को मेरे जब घेरा
वो विद्या भी काम ना आई जो झूठ बोल के सीखी
परशुराम की श्राप का असर है बातें लगती होगी तीखी
और तुमको भ्रम है कवच कुंडल का किया है तुमने दान
पिछले जन्मों के कर्म है तुम हो जिससे अनजान
वसुदेव क्यों मेरे साथ खड़े क्यों कवच ये तुमने पाए
लोकगाथा सुनाता हूं तुमको क्यों सूर्यपुत्र कहलाए
तुम दुर्धुव नामक रक्षस थे हम विष्णु अंश अवतार
अर्था कृष्ण नारायण थे तेरा होगा हमसे संघर
तुम्हे सूर्य देव वरदान दिए तुम्हे सौ कवच थे प्राप्त
हजार वर्ष तपस्या करे वो कर सकेगा समाप्त
पर जो भी कवच को तोड़ेगा मृत्यु उसकी हो जाएगी
विष्णु ने दो अवतार लिए जो सृष्टि भूल न पाएगी
नर एक कवच को तोड़ते तो मृत्यु नींद्रा में सो जाते
नारायण की तपस्या से वो फिर से जीवित हो जाते
अब नर तपस्या कर रहे नारायण युद्ध में लड़ते रहे
हम बारी बारी जाते रहे और कवच तोड़कर बढ़ते रहे
जब एक तपस्या करता तो दूजा कवच को तोड़े
ऐसे कर हम दोनों ने निन्यान्वे कवच थे फोड़े
अब अंतिम कवच की बारी थी तुम सूर्य शरण में चले गए
वो सोमवा कवच था मिला तुम्हे जो इंद्र देव जी ले गए
अगर फिर से कवच मैं तोड़ देता तो मृत्यु मेरी हो जाती
विष्णु जी के न्याय चक्र से पृथ्वी वंचित हो जाती
सूर्य देव ने बुद्धि से तुम्हे बड़ा भाई बनाया
अब समझ आया क्यों माता कुन्ती ने राज ये छिपाया
अगर ज्ञात हो जाता पहले मुझको युद्ध न करने देता
एक छोटे भाई के हाथों अपना ज्येष्ठ न मरने देता
लो नर नारायण आए हैं उद्धार तुम्हारा करने
मैं गीता ज्ञान न लेता तो न देता तुमको मरने
लो नर नारायण आए हैं उद्धार तुम्हारा करने
मैं गीता ज्ञान न लेता तो न देता तुमको मरने
अस्त्र शस्त्र और वेदों का तुम्हें भली भांति है ज्ञान
पर सूत पुत्र ये कर्ण तुम्हारा तोड़ेगा अभिमान
समस्त जगत ये जानेगा कि मैं ही था बलवान
अरे सृष्टि ने अन्याय किया मैं क्यों न करूं गुमान
तुम्हें मेरे दुखों और पीड़ा का न है अर्जुन अनुमान
अरे बचपन से ना जाने अर्जुन क्या क्या मैंने देखा
मुझे लगता मेरे हाथों की संघर्ष भरी है रेखा
मेरी मां ने मुझको पैदा होते नदी में बहाया
मैं सूर्यपुत्र हूं किंतु एक सूत पुत्र कहलाया
मेरे साथ हुआ अन्याय गुरु द्रोण ने ना दी शिक्षा
अरे जीवन भर ही देता रहा सामर्थ्य की परीक्षा
क्रीड़ा स्थल में तुमने अर्जुन करतब क्या दिखलाए
गुरु द्रोण तो अभिमान में भूले न समाए
जब भरी सभा में गुरु द्रोण ने अर्जुन का बखान किया
चोट लगी मेरे सीने सारे योद्धा का अपमान किया
मुझसे ना जरा भी सहन हुआ मैंने तुमको ललकारा
सभा में बैठे सबने मुझको सूत पुत्र पुकारा
मेरी विद्या का अपमान हुआ मैं भाग भी ना ले पाया
वो दुर्योधन था साथ खड़ा मुझे अंगराज बनाया
चाहे पापी था या कपटी मुझको है उस पे मान
अरे मित्रता की खातिर अपने दे दूंगा प्राण
द्रोपती के स्वयंभर में भी बना ना प्रतिभागी
मुझे सूत पुत्र कह रोका गया क्रोध अग्नि भीतर लागी
श्री परशुराम से विद्या पाई मिल गया उनसे श्राप
निष्ठा पूर्वक की सेवा फिर हो गया कैसा पाप
मां कुंती आई युद्ध से पूर्व मुझको सत्य बताने
मेरी परवाह ना थी उनको वो चाहे माने या ना माने
पांचों पुत्रों का जीवन दान माता कुंती ने मांगा
पांचों की फिकर थी उनको क्यों छठवें को ना मांगा
मैंने भी दे दिया वचन कि मां तेरे पांच पुत्र रहेंगे
कोई एक मरेगा अर्जुन या मैं जिंदा पांच बचेंगे
इंदर भी आए भेष बदल मैंने कवच को दे दिया दान
मैं पहले से ये जान गया था बन के रहा अनजान
करे भीष्म पितामह पक्षपात मुझे नफरत वो करते थे
मुझे रण में जाने से रोकते थे क्या युद्ध से वो डरते थे
हे अर्जुन कैसा लिखा था ये विधि का विधान
मेरे काम ना कोई आ पाया जो मिला था मुझको ज्ञान
मेरा पहिया रथ का धस गया मैं विद्या भूल गया सारी
मैं समझ ना पाया माधव की ये माया थी तुम्हारी
मेरे सामर्थ्य का परिचय अब कभी ना हो पाएगा
मुझे इसी बात का अंत तक अफसोस ही रह जाएगा
मेरे सामर्थ्य का परिचय अब कभी ना हो पाएगा
मुझे इसी बात का अंत तक अफसोस ही रह जाएगा
मैं द्रोणाचार्य का शिष्य अर्जुन है मेरा नाम
कुरुक्षेत्र के रण में थे सारथी मेरे श्याम
मैं अनुज आपका दानवीर करता हूं परिणाम
माधव के बताएं पथ पे चलना मेरा काम
क्यों सदा धर्म की बात करो जब धर्म पे चल ना पाए
क्यों दुर्योधन के पीछे लगकर पाप तुमने कमाए
मुझे युद्ध में हराने के लिए सब सीमा लांघ आए
सही गलत का दानवीर तुम फर्क समझ ना पाए
माना कि माता कुंती से हो गई थी भ्राता भूल
पर सारा जीवन पाप के उनको चुभते थे ये शूल
माता को भी था दर्द हुआ जब तुम्हें किया था दूर
पर कन्या कुंवारी करती क्या वो बेवस्ती मजबूर
समाज के डर से सत्य छिपा वो कैसी रीति होगी
मैं सोच भी ना सकता क्या भ्राता तुम पे बीती होगी
माता ने जो भी पाप किया वो जीवन भर छिपाती रही
तुम्हें याद करके भराता मैया आंसू रोज बहाती रही
मां कुंती ने तुमको त्यागा क्या मेरा था कसूर
एक अनुज के हाथों ज्येष्ठ मरा किया नियती ने मजबूर
गुरु द्रोण ने शिक्षा देने से ना कभी भी तुमको रोका
पर तुमको मुझसे श्रेष्ठ बनने का चाहिए था बस मौका
गुरु द्रोण ने मुझसे स्पर्धा के लिए क्षत्रियों को पुकारा
तुमने आके तब अहंकार में मुझको था ललकारा
इस बात का फायदा उठाकर दुर्योधन आगे आया
अपने स्वार्थ में मूर्ख ने तुमको अंगराज बनाया
मैं मानता हूं कि सूत पुत्र कह सबने किया अपमान
पर दुर्योधन की चालों से तुम तनिक ना थे अनजान
अरे द्युत सभा में दुर्योधन को तुमने था उकसाया
और मायावी पासों से पांचाली का दाब लगवाया
तुम जानते थे कि शकुनी के मायावी थे वो पासे
अब देखो भ्राता रण में कैसे बिछी पड़ी है लाशें
तुम्हें लगता था कि भीष्म पितामह नफरत तुमसे करते थे
सत्य तुम्हारा जानते थे और फिकर तुम्हारी करते थे
लगता था कि भीष्म पितामह नफरत तुमसे करते थे
वो सत्य तुम्हारा जानते थे और फिकर तुम्हारी करते थे
तुम दान सदा ही करते रहे और दानवीर कहलाए
सब पुण्य तुम्हारे फीके पड़े तो पाप तुमने कब आए
जब भरी सभा में पांचाली को वैश्य तुमने बुलाया
और अभिमन्यु का वध किया उसे चक्रव्यूह में फंसाया
तुम दुखी हो करण की नियती ने क्यों मुख है तुमसे फेरा
तब धर्म कहां था सात लोगों ने पुत्र को मेरे जब घेरा
वो विद्या भी काम ना आई जो झूठ बोल के सीखी
परशुराम की श्राप का असर है बातें लगती होगी तीखी
और तुमको भ्रम है कवच कुंडल का किया है तुमने दान
पिछले जन्मों के कर्म है तुम हो जिससे अनजान
वसुदेव क्यों मेरे साथ खड़े क्यों कवच ये तुमने पाए
लोकगाथा सुनाता हूं तुमको क्यों सूर्यपुत्र कहलाए
तुम दुर्धुव नामक रक्षस थे हम विष्णु अंश अवतार
अर्था कृष्ण नारायण थे तेरा होगा हमसे संघर
तुम्हे सूर्य देव वरदान दिए तुम्हे सौ कवच थे प्राप्त
हजार वर्ष तपस्या करे वो कर सकेगा समाप्त
पर जो भी कवच को तोड़ेगा मृत्यु उसकी हो जाएगी
विष्णु ने दो अवतार लिए जो सृष्टि भूल न पाएगी
नर एक कवच को तोड़ते तो मृत्यु नींद्रा में सो जाते
नारायण की तपस्या से वो फिर से जीवित हो जाते
अब नर तपस्या कर रहे नारायण युद्ध में लड़ते रहे
हम बारी बारी जाते रहे और कवच तोड़कर बढ़ते रहे
जब एक तपस्या करता तो दूजा कवच को तोड़े
ऐसे कर हम दोनों ने निन्यान्वे कवच थे फोड़े
अब अंतिम कवच की बारी थी तुम सूर्य शरण में चले गए
वो सोमवा कवच था मिला तुम्हे जो इंद्र देव जी ले गए
अगर फिर से कवच मैं तोड़ देता तो मृत्यु मेरी हो जाती
विष्णु जी के न्याय चक्र से पृथ्वी वंचित हो जाती
सूर्य देव ने बुद्धि से तुम्हे बड़ा भाई बनाया
अब समझ आया क्यों माता कुन्ती ने राज ये छिपाया
अगर ज्ञात हो जाता पहले मुझको युद्ध न करने देता
एक छोटे भाई के हाथों अपना ज्येष्ठ न मरने देता
लो नर नारायण आए हैं उद्धार तुम्हारा करने
मैं गीता ज्ञान न लेता तो न देता तुमको मरने
लो नर नारायण आए हैं उद्धार तुम्हारा करने
मैं गीता ज्ञान न लेता तो न देता तुमको मरने