Ek Tha Gul Aur Ek Thi Bulbul (From "Jab Jab Phool Khile")
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📜 Lyrics
एक था गुल और एक थी बुलबुल
दोनों चमन में रहते थे
है ये कहानी बिल्कुल सच्ची
मेरे नाना कहते थे
एक था गुल और एक थी बुलबुल
बुलबुल कुछ ऐसे गाती थी
जैसे तुम बातें करती हो
वो गुल ऐसे शर्माता था
जैसे मैं घबरा जाता हूँ
बुलबुल को मालूम नहीं था
गुल ऐसे क्यों शरमाता था
वो क्या जाने उसका नग़मा
गुल के दिल को धड़काता था
दिल के भेद ना आते लब पे
ये दिल में ही रहते थे
एक था गुल और एक थी बुलबुल
लेकिन आख़िर दिल की बातें
ऐसे कितने दिन छुपती हैं
ये वो कलियां हैं जो इक दिन
बस काँटे बनके चुभती हैं
इक दिन जान लिया बुलबुल ने
वो गुल उसका दीवाना है
तुमको पसन्द आया हो तो बोलूं
फिर आगे जो अफ़साना है
इक दूजे का हो जाने पर
वो दोनों मजबूर हुए
उन दोनों के प्यार के क़िस्से
गुलशन में मशहूर हुए
साथ जियेंगे साथ मरेंगे
वो दोनों ये कहते थे
एक था गुल और एक थी बुलबुल
फिर इक दिन की बात सुनाऊं
इक सय्याद चमन में आया
ले गये वो बुलबुल को पकड़के
और दीवाना गुल मुरझाया
शायर लोग बयां करते हैं
ऐसे उनकी जुदाई की बातें
गाते थे ये गीत वो दोनों
सैयां बिना नहीं कटती रातें
मस्त बहारों का मौसम था
आँख से आंसू बहते थे
एक था गुल और एक थी बुलबुल
आती थी आवाज़ हमेशा
ये झिलमिल झिलमिल तारों से
जिसका नाम मुहब्बत है वो
कब रुकती है दीवारों से
इक दिन आह गुल-ओ-बुलबुल की
उस पिंजरे से जा टकराई
टूटा पिंजरा छूटा क़ैदी
देता रहा सय्याद दुहाई
रोक सके ना उसको मिलके
सारा ज़माना सारी ख़ुदाई
गुल साजन को गीत सुनाने
बुलबुल बाग में वापस आए
याद सदा रखना ये कहानी
चाहे जीना चाहे मरना
तुम भी किसी से प्यार करो तो
प्यार गुल-ओ-बुलबुल सा करना
दोनों चमन में रहते थे
है ये कहानी बिल्कुल सच्ची
मेरे नाना कहते थे
एक था गुल और एक थी बुलबुल
बुलबुल कुछ ऐसे गाती थी
जैसे तुम बातें करती हो
वो गुल ऐसे शर्माता था
जैसे मैं घबरा जाता हूँ
बुलबुल को मालूम नहीं था
गुल ऐसे क्यों शरमाता था
वो क्या जाने उसका नग़मा
गुल के दिल को धड़काता था
दिल के भेद ना आते लब पे
ये दिल में ही रहते थे
एक था गुल और एक थी बुलबुल
लेकिन आख़िर दिल की बातें
ऐसे कितने दिन छुपती हैं
ये वो कलियां हैं जो इक दिन
बस काँटे बनके चुभती हैं
इक दिन जान लिया बुलबुल ने
वो गुल उसका दीवाना है
तुमको पसन्द आया हो तो बोलूं
फिर आगे जो अफ़साना है
इक दूजे का हो जाने पर
वो दोनों मजबूर हुए
उन दोनों के प्यार के क़िस्से
गुलशन में मशहूर हुए
साथ जियेंगे साथ मरेंगे
वो दोनों ये कहते थे
एक था गुल और एक थी बुलबुल
फिर इक दिन की बात सुनाऊं
इक सय्याद चमन में आया
ले गये वो बुलबुल को पकड़के
और दीवाना गुल मुरझाया
शायर लोग बयां करते हैं
ऐसे उनकी जुदाई की बातें
गाते थे ये गीत वो दोनों
सैयां बिना नहीं कटती रातें
मस्त बहारों का मौसम था
आँख से आंसू बहते थे
एक था गुल और एक थी बुलबुल
आती थी आवाज़ हमेशा
ये झिलमिल झिलमिल तारों से
जिसका नाम मुहब्बत है वो
कब रुकती है दीवारों से
इक दिन आह गुल-ओ-बुलबुल की
उस पिंजरे से जा टकराई
टूटा पिंजरा छूटा क़ैदी
देता रहा सय्याद दुहाई
रोक सके ना उसको मिलके
सारा ज़माना सारी ख़ुदाई
गुल साजन को गीत सुनाने
बुलबुल बाग में वापस आए
याद सदा रखना ये कहानी
चाहे जीना चाहे मरना
तुम भी किसी से प्यार करो तो
प्यार गुल-ओ-बुलबुल सा करना