Man Re Tu Kahe Na Dhir Dhare
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📜 Lyrics
मन रे तू काहे ना धीर धरे
वो निर्मोही मोह ना जाने, जिनका मोह करें
मन रे...
इस जीवन की चढ़ती ढलती
धूप को किसने बांधा
रंग पे किसने पहले डाले
रूप को किसने बांधा
काहे यह जतन करें
मन रे...
उतना ही उपकार समझ कोई
जितना साथ निभादे
जनम मरण का मेल हैं सपना
ये सपना बिसरा दे
कोई संग मेरे
मन रे...
वो निर्मोही मोह ना जाने, जिनका मोह करें
मन रे...
इस जीवन की चढ़ती ढलती
धूप को किसने बांधा
रंग पे किसने पहले डाले
रूप को किसने बांधा
काहे यह जतन करें
मन रे...
उतना ही उपकार समझ कोई
जितना साथ निभादे
जनम मरण का मेल हैं सपना
ये सपना बिसरा दे
कोई संग मेरे
मन रे...