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Gulzar Speaks - Khwab

👤 Gulzar 🎼 Marasim ⏱️ 1:04
🎵 1304 characters
⏱️ 1:04 duration
🆔 ID: 8784944

📜 Lyrics

सुबह सुबह इक ख्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला देखा
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आये हैं
आँखों से मानुस थे सारे
चेहरे सारे सुने सुनाए
पाँव धोए हाथ धुलाए
आँगन में आसन लगवाए
और तंदूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोट पकाए
पोटली में मेहमान मेरे
पिछले सालों की फसलों का गुड़ लाए थे

आँख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था
हाथ लगाकर देखा तो तंदूर अभी तक बुझा नहीं था
और होठों पे मीठे गुड़ का जायका अब तक चिपक रहा था
ख्वाब था शायद
ख्वाब ही होगा
सरहद पर कल रात सुना है चली थी गोली
सरहद पर कल रात सुना है
कुछ ख्वाबों का खून हुआ है

⏱️ Synced Lyrics

[00:00.79] सुबह सुबह इक ख्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला देखा
[00:05.84] सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आये हैं
[00:10.60] आँखों से मानुस थे सारे
[00:14.01] चेहरे सारे सुने सुनाए
[00:17.40] पाँव धोए हाथ धुलाए
[00:19.41] आँगन में आसन लगवाए
[00:22.92] और तंदूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोट पकाए
[00:27.60] पोटली में मेहमान मेरे
[00:29.53] पिछले सालों की फसलों का गुड़ लाए थे
[00:33.95] आँख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था
[00:39.71] हाथ लगाकर देखा तो तंदूर अभी तक बुझा नहीं था
[00:44.72] और होठों पे मीठे गुड़ का जायका अब तक चिपक रहा था
[00:50.62] ख्वाब था शायद
[00:53.35] ख्वाब ही होगा
[00:55.62] सरहद पर कल रात सुना है चली थी गोली
[00:58.86] सरहद पर कल रात सुना है
[01:02.10] कुछ ख्वाबों का खून हुआ है
[01:03.79]

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